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Tuesday, April 13, 2021

नव वर्ष और नवरात्रि महोत्सव

नव वर्ष और नवरात्रि महोत्सव

जीवन संक्षिप्त यात्रा हैं। भोर के सूर्य उदय के प्रकाश में घटनाक्रम से होकर घटना-चक्र से गुजरती हुई कब में इस जीवन की संध्या हो जाती हैं यह पता भी नहीं चलता है और नवीन चक्र आकर अपने साथ ले चलता है। यही वह सत्य स्त्रोत हैं और परस्पर गुंथा है। काल चक्र में परिक्रमा करना ही आत्मतत्व की नियति है तो आइये इस नव वर्ष में एक और मंगलमय यात्रा का आरंभ करें और समाज और संस्कृति से अपने आप को जोड़े। 
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया,
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुख भागभवेत।
ऊँ शांतिः शांतिः शांतिः
नव वर्ष और नवरात्रि महोत्सव पर शुभकामनाएं और बधाई ❤️❤️❤️
-अरुण अभ्युदय शर्मा
#arunaksarun

Wednesday, January 27, 2021

मेरी अरदास

मेरी अरदास"

*मैं शांत था, 
मैं मौन था
मैं चुप था, 
क्योंकि गूरु की परंपरा 
मानते हुए भी अमृतधारी नहीं था,
इसलिए सहमा हुआ सा
पंथ के ठेकेदार से दूर 
दरबार साहिब में हाथ 
जोड़कर कोने में खड़ा था,
और गूरु भक्ति, लंगर की 
दाल रोटी और कार सेवा में खोया हुआ था,

कब कब तुम देश द्रोहियों ने 
भारत तेरे टुकड़े होंगे के नारे लगाए
न जाने कितनी बार तिरंगे जलाऐ
दरिंदगी दिखाकर मुझे 
और मेरे "अक्स" हिंदू भाई को डराया  
हम दोनों को अपने ही 
घर में  शरणार्थी बनाया,*

*सोचता था सुबह में 
बस रोटी का,
शाम को मौज लेता था 
मयस्सर मस्ती में अपनी हस्ती का,

मन लगाता था बस 
दोस्तों की बस्ती में, 
और मानता था 
भाड़ में जाए country सारी,
अगर सस्ती मिल जाए 
मुर्ग मदिरा खूब सारी*

*देश धर्म प्रतिष्ठा अच्छाई
सब भूल बैठा और 
 दुश्मनों को दोस्त समझ बैठा
बुर्जुगों के बलिदान रक्त 
को भूला दिया
झटके को भूल जिव्हा 
स्वाद ने ग़ुलाम बना दिया*

* साहिबजादों की बलि को 
कड़वी गोली समझ निगल लिया 
अपने स्वार्थ सिद्धि को सच समझ लिया,

आक्रांताओं के वंशज की 
गोद में बैठ गया
गूरु के वध को नादान बन 
मीठी गोली में लपेट निगल गया*

*अब है जागी हिम्मत, 
कथनी और करनी में अंतर स्पष्ट करना है
अब मां भारती के धर्म 
और संस्कृति पर मर मिटना है,
नक़ली स्वाभिमान और सरदारी 
के पीछे छिपना बंद करना है,
त्याग की परिभाषा को 
साफ़ साफ़ गढ़ना है,*

*नहीं बनना अब खिलौना
देश के दुश्मनों के हाथ का
ढाहनी है दीवारें अब सीमा की, 
मिलकर साथ बढ़कर 
वापस लेनी है नानक भूमि 
और हिंगलाज माता सारी*

हे वाहे गुरुजी अब सच्ची अरदास करनी है,
कबूल कर लो, बस यही बिनती करनी है,
अखण्ड भारत राष्ट्र की निर्माण में मेरा भी रक्त मिला दो,
भाईयों के बीच एकता की दीवार और ऊंची बना दो। 
- अरुण अभ्युदय शर्मा
#arunaksarun
२७/०१/२०२१

Saturday, January 23, 2021

अहम् शिवास्मि

"अहम् शिवास्मि"
तुमसे अलग नहीं हूं मैं,
तुम्हारी तरह ही सांस लेता हूं मैं,

तुम्हारी तरह ही पीड़ा महसूस करता हूं मैं,
तुम्हारी तरह ही थक जाता हूं मैं,

रोज तुम्हारी तरह ही मरता हूं मैं 
और फिर अगली सुबह नये जीवन के लिए प्रेरित होता हूं मैं,

पर अब उदित हुआ तो,
" अक्स" मैं, मैं न था, तुम, तुम न थे,
हम दोनों के बीच दूरी अब न थी,

इस मैं को मिटाया है
अब तुम्हारी बारी है
बांध सको तो बांध लो
हम अब दूर नहीं है।।

-अरुण अभ्युदय शर्मा
#arunaksarun

Tuesday, January 19, 2021

"राम रामेति रामेति - अक्स मन में संघर्ष

"राम रामेति रामेति"

कागज़ के पन्नों से मंदिर नहीं बनते,

रास्तों को रोकने से पहाड़ नहीं पनपते, 

तूफानी नदी का रास्ता रोकने से सागर नहीं बनते,

हर कदम संघर्ष करते  रहो,

 उफनते सागर पर पुल बनाते रहो, 

 हार कर पुनः बारंबार 
खड़े होते रहो इस अंतहीन जीवन में,

क्योंकि "अक्स" ऐसे ही बिना वनवास जाये हर कोई राम,  राम नहीं बनते,

वैसे ही सती के विरह वेदना के बिना शिव , सत्य शिव न बनते , 

शिव, सत्य शिव न बनते।।

ऊं नमः शिवाय

-अरुण अभ्युदय शर्मा
#arunaksarun